850 सांसद: विकास या सरेआम लूट?
विशेष रिपोर्ट: 850 सांसद या 850 नए खर्चे? जनता के पसीने की कमाई पर ‘सियासी डकैती’!
नई दिल्ली: क्या भारत एक ‘लोकतंत्र’ है या ‘नेताओं का तंत्र’? यह सवाल आज हर उस करदाता के मन में है जो सुबह से शाम तक हाड़-तोड़ मेहनत करके सरकार का खजाना भरता है। सरकार लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने की तैयारी में है, लेकिन क्या किसी ने पूछा कि इस विलासिता का बिल कौन भरेगा?
सवाल नंबर 1: विकास के नाम पर ‘सफेद हाथियों’ की फौज क्यों?
एक तरफ देश कर्ज के तले दबा जा रहा है, दूसरी तरफ सांसदों की संख्या बढ़ाने का जुनून है। जब एक सांसद पर महीने का 5 लाख रुपया खर्च होता है, तो 850 सांसदों का सालाना खर्च अरबों में होगा। जनता पूछती है—काम के नाम पर ‘जीरो’ और कमीशनखोरी में ‘हीरो’ रहने वाले इन नेताओं की फौज बढ़ाकर क्या हासिल होगा? क्या 543 सांसद देश लूटने के लिए कम पड़ रहे थे जो अब कुर्सियों की संख्या बढ़ाई जा रही है?
सवाल नंबर 2: महिला आरक्षण या ‘खास’ महिलाओं का क्लब?
33% महिला आरक्षण का शोर तो बहुत है, लेकिन नीयत पर शक है। अगर महिलाओं का सम्मान करना है, तो मौजूदा 543 सीटों में से ही उन्हें हिस्सा क्यों नहीं दिया जाता? क्या सीटें बढ़ाना केवल अपने राजनैतिक मोहरों को सेट करने का तरीका है? डर यह है कि संसद में किसी गरीब किसान या मजदूर की बेटी नहीं, बल्कि कंगना, जया बच्चन और स्मृति ईरानी जैसे रसूखदार चेहरे ही चमकेंगे। क्या आम महिला के लिए संसद के दरवाजे हमेशा बंद रहेंगे?
सवाल नंबर 3: प्रशासनिक ढांचा या लूट का अड्डा?
जब विकास की सारी जिम्मेदारी सांसद और विधायक की है, तो फिर नगर पालिकाओं और नगर निगमों का जाल क्यों बिछाया गया है? क्या यह केवल नेताओं के चेले-चपाटों को ‘पार्षद’ और ‘अध्यक्ष’ बनाकर एडजेस्ट करने की जगह है? जनता के टैक्स का पैसा नाली-सड़क के नाम पर दो-दो जगह से क्यों निकाला जा रहा है? क्यों न इन ‘सफेद हाथियों’ को खत्म कर सीधे जवाबदेही तय की जाए?
सिस्टम से सीधे 4 तीखे सवाल:
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पेंशन का मोह क्यों? जो सेना का जवान देश के लिए जान देता है उसकी पेंशन पर सवाल हैं, तो फिर 5 साल एसी में बैठने वाले नेताओं को ‘आजीवन पेंशन’ की रेवड़ी क्यों?
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टैक्स से छूट क्यों? आम आदमी सुई से लेकर कार तक पर टैक्स देता है, तो नेताओं की भारी-भरकम सैलरी ‘टैक्स फ्री’ क्यों? क्या ये ‘Right to Equality’ का अपमान नहीं है?
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सुरक्षा का तमाशा क्यों? वोट मांगते समय जो नेता जनता के पैरों में गिरते थे, जीतने के बाद उन्हें Y+ सिक्योरिटी का घेरा क्यों चाहिए? जनता से इतना डर है तो इस्तीफा क्यों नहीं देते? इस सुरक्षा का खर्च नेता अपनी जेब से क्यों नहीं भरते?
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फंड की बंदरबांट कब रुकेगी? विधायक और सांसद निधि का 50 से 60% हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। जब हर विभाग का बजट अलग है, तो नेताओं को अलग से ‘निधि’ क्यों दी जा रही है?
बड़ी बात: सरकारें टैक्स लेकर ‘मौज-मस्ती’ में उड़ा रही हैं और खजाना खाली होते ही विदेशी बैंकों से कर्ज ले लेती हैं। आज भारत का हर बच्चा कर्ज के साथ पैदा हो रहा है, जबकि नेताओं की संपत्ति दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ रही है। जनता अब जाग चुकी है और पूछ रही है—“हमारा पैसा, आपकी अय्याशी… आखिर कब तक?”
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazin)

