DTC के 8000 ड्राइवरों की नौकरी पर संकट!
DTC कर्मचारियों पर मंडराया बेरोजगारी का खतरा! 8000 ड्राइवर स्टीयरिंग छोड़ टिकट चेक करने को मजबूर, CM रेखा गुप्ता से लगाई गुहार
नई दिल्ली: दिल्ली परिवहन निगम (DTC) के हजारों कर्मचारियों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। निजी कंपनियों के बढ़ते दखल और क्लस्टर स्कीम के तहत आने वाली बसों ने डीटीसी के स्थायी और अनुबंधित चालकों की नींद उड़ा दी है। आलम यह है कि करीब 8000 बस चालक आज बस चलाने के बजाय टिकट चेकिंग जैसे अन्य कामों में लगाए गए हैं, जिससे उन्हें अपनी नौकरी जाने का डर सता रहा है।
कर्मचारियों ने अब दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से हस्तक्षेप की मांग करते हुए ‘निजीकरण’ के बजाय डीटीसी की अपनी बसें सड़कों पर उतारने की अपील की है।
आखिर क्यों अधर में है 8000 चालकों का भविष्य?
डीटीसी में संकट की शुरुआत तब हुई जब उम्र पूरी होने के कारण निगम की अपनी 2500 से अधिक बसें सड़कों से हट गईं। इन बसों पर तैनात लगभग 5000 चालकों के पास अचानक कोई काम नहीं रहा। इसके अलावा:
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इलेक्ट्रिक बसों का पेंच: इस साल करीब 1400 नई इलेक्ट्रिक बसें बेड़े में शामिल हुईं, लेकिन ये बसें ‘किलोमीटर स्कीम’ के तहत निजी कंपनियों की हैं।
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कंडक्टर डीटीसी का, ड्राइवर कंपनी का: इन निजी बसों में केवल कंडक्टर डीटीसी का होता है, जबकि ड्राइवर निजी कंपनियां अपने हिसाब से रखती हैं।
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अनुभव की कमी: कर्मचारी यूनियनों का आरोप है कि निजी कंपनियों के ड्राइवर कम अनुभवी हैं, जिससे सड़क सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
“पढ़ा-लिखा ड्राइवर, अब काट रहा है टिकट”
डीटीसी में वर्तमान में करीब 25,000 अनुबंधित और 7,000 स्थायी कर्मचारी हैं। इनमें से 8000 चालक (4500 अनुबंधित और 3500 स्थायी) ऐसे हैं जिनके पास चलाने को बसें नहीं हैं। निगम ने अपनी साख बचाने के लिए इन्हें टिकट जांच (Ticket Checking) और अन्य डिपो कार्यों में लगा रखा है, लेकिन कर्मचारी इसे अपनी कार्यक्षमता और भविष्य के साथ खिलवाड़ मान रहे हैं।
डीटीसी कर्मचारी एकता यूनियन ने खोला मोर्चा
यूनियन के अध्यक्ष ललित चौधरी और महामंत्री मनोज शर्मा ने निजी कंपनियों के बढ़ते वर्चस्व का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने साफ कहा:
“अगर सरकार निजी कंपनियों के माध्यम से ही बसें चलाएगी, तो डीटीसी के अपने कर्मचारियों का क्या होगा? सरकार को अपनी बसें खरीदनी चाहिए और उन्हें अंतरराज्यीय रूटों पर भी चलाना चाहिए। इससे न केवल कर्मचारियों का भविष्य सुरक्षित होगा, बल्कि सरकार को भारी मुनाफा भी होगा।”
क्या कहता है प्रशासन?
विवाद के बीच डीटीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सफाई देते हुए कहा कि बसों की संख्या कम होने के बावजूद किसी भी कर्मचारी की छंटनी नहीं की गई है। सभी चालकों को वैकल्पिक काम दिया गया है ताकि उनका वेतन न रुके।
निष्कर्ष: निजीकरण बनाम सरकारी सेवा
दिल्ली की लाइफलाइन कही जाने वाली डीटीसी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के सामने चुनौती है कि वे राजधानी की परिवहन व्यवस्था को आधुनिक बनाने के साथ-साथ इन हजारों परिवारों के रोजगार की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करती हैं।
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