PAK की जीत: मुनीर बने ‘प्रिय भाई’
PAK के ‘प्लान’ में फंसा अमेरिका-ईरान: मुनीर कैसे बने ‘प्रिय भाई’ और पाकिस्तान को क्या मिला?
इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया में जारी विनाशकारी युद्ध के बीच पाकिस्तान एक बड़े ‘पीसमेकर’ (शांतिदूत) के रूप में उभरा है। अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम (Ceasefire) को संभव बनाने में पाकिस्तान की ‘बैकचैनल डिप्लोमेसी’ ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। ईरानी नेतृत्व द्वारा पाकिस्तानी सेना प्रमुख को ‘प्रिय भाई’ कहकर संबोधित करना इस समझौते की सफलता और गहराई को बयां करता है।
📌 ‘मुनीर’ की मध्यस्थता और पाकिस्तान का मास्टरस्ट्रोक
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान के सैन्य और नागरिक नेतृत्व ने मिलकर एक ऐसा प्लान तैयार किया, जिससे दोनों कट्टर दुश्मन झुकने को तैयार हुए:
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जनरल असीम मुनीर की भूमिका: पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के बीच एक भरोसेमंद पुल का काम किया। उनकी सक्रिय मध्यस्थता का ही नतीजा है कि ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने उनके और पीएम शहबाज शरीफ के प्रयासों की सार्वजनिक सराहना की।
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मुनीर बने ‘प्रिय भाई’: ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने जनरल मुनीर को ‘प्रिय भाई’ कहकर संबोधित किया। यह न केवल व्यक्तिगत सम्मान है, बल्कि पाकिस्तान और ईरान के बीच हालिया सीमा विवादों के बाद रिश्तों में आए एक बड़े कूटनीतिक बदलाव का संकेत है।
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शहबाज शरीफ की कूटनीति: प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तुर्की और कतर जैसे देशों को साथ लेकर एक ऐसा माहौल बनाया, जिससे अमेरिका और ईरान के लिए बातचीत ही एकमात्र विकल्प बचा।
📍 पाकिस्तान को होने वाले 3 बड़े फायदे
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ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): युद्ध के कारण तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, जिससे पाकिस्तान की पहले से नाजुक अर्थव्यवस्था ढहने की कगार पर थी। सीजफायर और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने से पाकिस्तान को अब सस्ती और निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
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क्षेत्रीय स्थिरता: ईरान-अमेरिका युद्ध का सीधा असर पाकिस्तान की सीमाओं और सुरक्षा पर पड़ रहा था। शरणार्थी संकट और क्षेत्रीय उग्रवाद को रोकने में यह समझौता पाकिस्तान के लिए ‘कवच’ का काम करेगा।
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अंतरराष्ट्रीय साख में सुधार: आर्थिक तंगी और आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान ने इस सफल मध्यस्थता के जरिए साबित कर दिया कि वह वैश्विक कूटनीति में आज भी एक अनिवार्य खिलाड़ी (Key Player) है।
इस्लामाबाद में ‘शांति की अग्निपरीक्षा’
इस सीजफायर के बाद अब 10 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच औपचारिक शांति वार्ता शुरू होने जा रही है। पूरी दुनिया की नजरें पाकिस्तान पर टिकी हैं—क्या वह इस 14 दिनों की राहत को एक स्थायी शांति संधि में बदल पाएगा?
विश्लेषण: रणनीति या मजबूरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ने अपनी भौगोलिक स्थिति का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। ईरान का पड़ोसी होने और अमेरिका का रणनीतिक साझेदार होने के नाते, इस्लामाबाद ही वह एकमात्र केंद्र था जहाँ दोनों पक्ष एक साथ मेज पर बैठ सकते थे।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)

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