युद्ध में कोई जीतता नहीं, हारता हर कोई है

पूजा अनिल, स्पेन

हिंदी लेखिका और शिक्षिका

युद्ध मानव सभ्यता के इतिहास का एक ऐसा दुखद अध्याय है, जो वीरता और विजय की कथाओं से अधिक पीड़ा, विनाश और त्रासदी की कहानी कहता है। यद्यपि कई बार युद्ध को राष्ट्रीय गौरव, सुरक्षा या न्याय की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, किन्तु गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि युद्ध में वास्तविक अर्थों में कोई जीत नहीं होती।

जो राष्ट्र विजयी घोषित होते हैं, वे भी मानवीय, आर्थिक और नैतिक स्तर पर भारी कीमत चुकाते हैं। अंततः हार मानवता की ही होती है।

इतिहास इस सत्य का साक्षी है। प्रथम विश्व युद्ध ने यूरोप सहित विश्व के अनेक देशों को गहरे संकट में डाल दिया। करोड़ों सैनिकों और नागरिकों की मृत्यु हुई, अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा गईं और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। इसके कुछ ही दशकों बाद द्वितीय विश्व युद्ध और भी अधिक व्यापक विनाश का कारण बना।

इस युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए, जिससे तत्काल लाखों लोग मारे गए और आने वाली पीढ़ियाँ भी विकिरण के दुष्प्रभाव झेलती रहीं। यद्यपि मित्र राष्ट्र विजयी घोषित हुए, किंतु सोचने वाली बात है कि क्या वे वास्तव में विजेता थे, जब संपूर्ण मानवता को इतना बड़ा घाव मिला?

कहने की बात नहीं है लेकिन सत्य यही है कि सेना के अलावा युद्ध का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है। सैनिक तो सीमा पर लड़ते हैं, परंतु उनके परिवार भय और अनिश्चितता में जीते हैं। युद्ध के कारण लाखों लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।

शरणार्थी शिविरों में जीवन बिताने वाले लोगों की पीड़ा किसी भी “विजय” से कहीं अधिक भारी होती है। बच्चे शिक्षा से वंचित हो जाते हैं, महिलाएँ असुरक्षा का सामना करती हैं और बुजुर्ग असहाय हो जाते हैं। इस प्रकार युद्ध समाज की जड़ों को हिला देता है।

आर्थिक दृष्टि से भी युद्ध विनाशकारी होता है। किसी भी देश का विकास शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान और बुनियादी ढांचे में निवेश पर निर्भर करता है। किंतु युद्ध की स्थिति में यही संसाधन हथियारों, गोला-बारूद और सैन्य तैयारियों पर खर्च होने लगते हैं। परिणामस्वरूप विकास रुक जाता है और गरीबी बढ़ती है।

युद्ध समाप्त होने के बाद भी पुनर्निर्माण में वर्षों, कभी-कभी दशकों का समय लग जाता है। इस दौरान जनता को निरंतर महंगाई, बेरोजगारी और अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।

नैतिक और मानवीय दृष्टि से भी युद्ध गहरे प्रश्न खड़े करता है। क्या हम यह नहीं जानते कि हिंसा के माध्यम से समस्या का समाधान खोजने की प्रवृत्ति मानव मूल्यों के विरुद्ध है। जब युद्ध में निर्दोष लोगों की जान जाती है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि “विजय” शब्द का अर्थ कितना खोखला है! मानवाधिकारों का उल्लंघन, युद्ध अपराध और अमानवीय अत्याचार युद्ध की कड़वी सच्चाईयाँ हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी भी देश द्वारा जीत का दावा करना संवेदनहीनता का प्रतीक बन जाता है।

आधुनिक युग में युद्ध का खतरा और भी भयावह हो गया है। परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियारों की उपस्थिति ने युद्ध को संपूर्ण मानव सभ्यता के लिए खतरा बना दिया है। यदि बड़े देशों के बीच व्यापक युद्ध छिड़ जाए, तो उसका प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा। पर्यावरणीय विनाश, वैश्विक आर्थिक मंदी और मानवीय संकट ऐसे परिणाम हैं, जिनसे कोई भी राष्ट्र अछूता नहीं रह सकता।

इसके अतिरिक्त, युद्ध मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी गहरे घाव छोड़ता है। सैनिकों को पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। युद्ध से प्रभावित बच्चे भय और असुरक्षा की भावना के साथ बड़े होते हैं। समाज में अविश्वास और घृणा की भावना पनपती है, जो आने वाली पीढ़ियों तक फैल सकती है। इस प्रकार युद्ध केवल वर्तमान को नहीं, भविष्य को भी प्रभावित करता है।

स्पष्ट है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। वास्तविक समाधान संवाद, कूटनीति और सहयोग में निहित है। जब राष्ट्र आपसी मतभेदों को बातचीत और समझौते के माध्यम से सुलझाते हैं, तब स्थायी शांति संभव होती है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और वैश्विक सहयोग शांति स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इतिहास ने यह भी दिखाया है कि युद्ध के बाद अंततः वार्ता की मेज पर ही समाधान खोजा जाता है। यदि ऐसा बाद में करना ही है, तो युद्ध के स्थान पर सीधे संवाद को प्राथमिकता क्यों न दी जाए? बड़े बड़े धमाकों द्वारा खंडहर हुए टूटे फूटे शहरों की जगह क्यों न सभ्य तौर तरीके अपनाए जाएँ?

अंततः यही कहना चाहती हूँ कि युद्ध में कोई सच्ची जीत नहीं होती। जो राष्ट्र विजयी घोषित होते हैं, वे भी अपनों की हानि, आर्थिक क्षति और नैतिक प्रश्नों से जूझते हैं। मानवता का वास्तविक उत्थान शांति, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान में है। यदि विश्व समुदाय इस सत्य को स्वीकार कर ले, तो संघर्षों को हिंसा के बजाय समझदारी और सहयोग से सुलझाया जा सकता है। यही वह मार्ग है, जो एक सुरक्षित, समृद्ध और मानवीय भविष्य की ओर ले जाता है।

पूजा अनिल, स्पेन

हिंदी लेखिका और शिक्षिका

 

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