समाजवादी पार्टी (सपा) में एक बार फिर गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है
बरेली। समाजवादी पार्टी (सपा) में एक बार फिर गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। खुद को उत्तर प्रदेश में सबसे मज़बूत विपक्षी पार्टी बताने वाली सपा के अंदरूनी हालात इस कदर बिखरे नज़र आ रहे हैं कि अब संगठनात्मक नियुक्तियों में भी आपसी खींचतान का असर दिखने लगा है।
ताज़ा मामला बरेली जिले का है, जहां प्रदेश संगठन ने शुक्रवार सुबह मयंक शुक्ला उर्फ मोंटी को जिला प्रवक्ता के रूप में नियुक्त किया, लेकिन शाम तक उनका नाम सूची से हटा दिया गया। यह निर्णय पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
सुबह बनी नियुक्ति, शाम को हटाया नाम
सूत्रों के अनुसार, समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय से शुक्रवार को जिलों के नए प्रवक्ताओं की सूची जारी की गई थी। इस सूची में बरेली से दो नाम शामिल थे मोहम्मद साजिद और मयंक शुक्ला उर्फ मोंटी। दोनों की नियुक्ति पर कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर बधाई दी और मोंटी शुक्ला के संगठन के प्रति समर्पण की तारीफ भी की।
लेकिन शाम होते-होते प्रदेश कार्यालय से नई सूची जारी हुई, जिसमें मोंटी शुक्ला का नाम हटा दिया गया।
इस अप्रत्याशित बदलाव ने सपा कार्यकर्ताओं में हलचल मचा दी। कई लोग इसे पार्टी के अंदर चल रही “गुटबाजी” से जोड़कर देख रहे हैं।
मोंटी शुक्ला बोले “पार्टी का सिपाही हूं, पद नहीं सेवा मायने रखती है”
नाम सूची से हटने के बाद मोंटी शुक्ला उर्फ मोंटी ने बड़ा बयान देते हुए कहा
“मैं समाजवादी पार्टी का सिपाही हूं। मेरे लिए कोई पद या पदवी मायने नहीं रखती। पार्टी और नेताजी के विचारों के प्रति निष्ठा ही मेरी पहचान है। अगर संगठन ने कोई निर्णय लिया है तो मैं उसका सम्मान करता हूं। पार्टी हित मेरे लिए सर्वोपरि है और मैं हमेशा समाजवादी विचारधारा के लिए काम करता रहूंगा।”
उनकी इस विनम्र प्रतिक्रिया ने कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें और भी लोकप्रिय बना दिया है। कई युवाओं ने सोशल मीडिया पर मोंटी शुक्ला के पक्ष में पोस्ट डालते हुए लिखा कि “ऐसे ही समर्पित कार्यकर्ताओं की वजह से सपा मजबूत है।”
गुटबाजी पर उठे सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह घटनाक्रम सपा के अंदर चल रही खींचतान को उजागर करता है।
कुछ वरिष्ठ नेताओं के गुटों में टकराव के चलते योग्य और समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है। बरेली में भी पिछले कुछ महीनों से संगठनात्मक मामलों में दो धड़े साफ तौर पर देखे जा रहे हैं।
बरेली संगठन में रीलबाज नेताओं का बोलबाला
संगठन के अंदर कई ऐसे चेहरे उभर आए हैं जो सोशल मीडिया पर सक्रिय तो हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी की नीतियों और जनता के मुद्दों से कोसों दूर हैं।
ऐसे “रीलबाज नेता” केवल प्रचार में व्यस्त रहते हैं, जिससे वास्तविक समर्पित कार्यकर्ताओं की मेहनत दब जाती है।
पार्टी के अंदरूनी जानकारों का कहना है कि अगर यह प्रवृत्ति नहीं रुकी तो आने वाले दिनों में सपा को संगठनात्मक स्तर पर बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
कार्यकर्ताओं में रोष, मोंटी की सादगी और व्यवहार की चर्चा
मोंटी शुक्ला का नाम हटाए जाने के बाद कई स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि मोंटी जैसे कर्मठ और निष्ठावान कार्यकर्ता को संगठन से जोड़कर रखना चाहिए।
मोंटी शुक्ला की सादगी, व्यवहार, मीडिया से उनके बेहतर संबंध और जनसंपर्क क्षमता को लेकर भी पार्टी में उनकी अलग पहचान रही है।
वे हमेशा बरेली मीडिया को पूरा सहयोग देते हैं और हर स्तर पर समाजवादी विचारधारा को सकारात्मक रूप से प्रचारित करने का काम करते हैं।
भविष्य में बड़ी भूमिका की उम्मीद
हालांकि मोंटी शुक्ला ने संगठन के निर्णय को पूरी तरह स्वीकार किया है, लेकिन उनके समर्थकों को उम्मीद है कि पार्टी नेतृत्व भविष्य में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देगा।
उनके समर्थक कहते हैं कि “मोंटी भाई पार्टी के सच्चे सिपाही हैं, वे कभी पीछे नहीं हटते। जनता के बीच उनकी छवि ईमानदार, मिलनसार और संघर्षशील कार्यकर्ता की है।”
आपको बता दे मोंटी शुक्ला का नाम प्रवक्ता सूची से हटना भले ही एक प्रशासनिक निर्णय रहा हो, लेकिन जिस परिपक्वता, निष्ठा और सादगी के साथ उन्होंने प्रतिक्रिया दी, उसने यह साबित कर दिया कि असली नेता वही है जो पद से नहीं, बल्कि अपनी सेवा भावना से पहचान बनाता है।
बरेली की सियासत में मोंटी शुक्ला उर्फ मोंटी जैसे सच्चे कार्यकर्ता ही पार्टी की असली ताकत हैं।
बरेली से रोहिताश की रिपोर्ट
